सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों ने नोएडा मज़दूर आंदोलन के दौरान हिंसा को लेकर गिरफ्तार एक्टिविस्टों के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की तरफ़ से अब तक चार एफआईआर में पेश चार्जशीट को पूरी तरह से ‘मनगढ़ंत कहानियों, झूठ और बनावटी बातों पर निर्भर’ करार दिया।
‘कैंपेन फॉर द रिलीज़ ऑफ़ वर्कर्स एंड एक्टिविस्ट्स ऑफ़ नोएडा’ (कारवाँ) ने 7 जुलाई 2026 को प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जिसे सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, हिमांशु कुमार, प्रोफेसर नंदिता नारायण, रक्स मीडिया कलेक्टिव के शुद्धाब्रत सेनगुप्ता, सुप्रीम कोर्ट की वकील कँवलप्रीत कौर और ज़िया कबीर चौधरी और ‘कारवाँ’ के केशव आनंद ने संबोधित किया।
केशव आनंद ने कहा कि चार्जशीट में बताई गई गिरफ्तारी की तारीखें रिमांड शीट में बताई गई तारीखों से बिल्कुल अलग हैं। आकृति, सृष्टि, रुपेश, मनीषा जिन्हें असल में यूपी पुलिस ने 11 अप्रैल को गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार किया था की गिरफ्तारी की तारीखें एफआईआर 163, 164, 165 की चार्जशीट और रिमांड शीट में अलग-अलग हैं। इतना ही नहीं, चार्जशीट में आरोपियों के लिए अलग-अलग जगहों का ज़िक्र भी किया गया है।
आनंद ने आरोप लगाया कि पुलिस ने अलग-अलग “सबूतों” की नकली बरामदगी दिखाई है। उदाहरण के लिए, केस डायरी 24, पेज 6 में दावा किया गया है कि आकृति का फ़ोन उसके उस बैग से बरामद हुआ था जो 26.04.2026 को निम्मी विहार में, पुलिस स्टेशन फेज़ 2 के पास एक पार्क में मिला था। लेकिन केस नंबर 169/2026 की चार्जशीट की केस डायरी 21 के अनुसार, आकृति के फ़ोन की आखिरी लोकेशन 11.04.2026 को शाम लगभग 7:04 बजे बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन थी, यानी उसी समय जब उसे यूपी पुलिस ने हिरासत में लिया था।
उन्होंने सवाल किया कि ऐसे में, पुलिस की हिरासत में रहते हुए वह मेट्रो स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर किसी जगह पर अपना बैग कैसे रख सकती थी? उन्होंने कहा कि चार्जशीट में कई और बेतुके दावे भी किए गए हैं, जैसे बच्चों की लाइब्रेरी के सार्वजनिक उद्घाटन को ‘साज़िश की बैठक’ बताना, मज़दूरों की मांगों को गैर-कानूनी बताना, और सत्यम वर्मा पर मार्क्सवादी होने का ‘आरोप’ लगाकर मार्क्सवादी विचारधारा को ही आपराधिक बताना।
सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने यूपी पुलिस के हाथों कानून-व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने के बारे में बात की। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बावजूद कि किसी भी ‘वामपंथी’ विचारधारा को मानना अपराध नहीं है, यूपी पुलिस ने ऐसा व्यवहार करने का फैसला किया है मानो इसके उलट बात सच हो।”
उन्होंने कहा कि यह कोई केस नहीं है, बल्कि लूटपाट करने वालों को यह बताने का एक संकेत है कि मज़दूरों से कोई समस्या नहीं है; एक्टिविस्टों को यह बताने का कि आवाज़ उठाने की यही कीमत चुकानी पड़ती है; बुद्धिजीवियों को यह बताने का कि आपको चुप रहना सीखना होगा; नागरिकों को यह बताने का कि आपको जेल में डाल दिया जाएगा और मीडिया भी चुप रहेगा।
उन्होंने कहा कि आज, जैसे-जैसे शासक और ज़्यादा तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं, वे सच से और ज़्यादा डरने लगे हैं। उन्होंने नोएडा केस में मज़दूरों और एक्टिविस्टों की रिहाई के लिए लड़ने वाले सभी लोगों के प्रति अपना समर्थन और सराहना व्यक्त की, क्योंकि यह सिर्फ़ कुछ लोगों को आज़ाद कराने की लड़ाई नहीं है, बल्कि हमारे देश में सच के लिए लड़ाई है।
सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने कहा कि फ़ैक्टरियों में अमानवीय काम की स्थितियां, बेहद कम वेतन और हालिया एलपीजी संकट ने देश भर में विरोध प्रदर्शनों की लहर पैदा की, जो नोएडा में अपने चरम पर पहुँच गई। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि सबसे साहसी मज़दूर और समाज के प्रति समर्पित निस्वार्थ छात्र, कलाकार और बुद्धिजीवी, जो मज़दूरों के साथ एकजुटता से खड़े हैं, उन्हें आज “आतंकवादी” और “अर्बन नक्सल” करार दिया जा रहा है!
हिमांशु कुमार ने कहा कि देश के मेहनतकश लोग और युवा अब पुलिस के झूठ और चालों को समझ गए हैं, जो शोषणकारी कंपनियों के साथ मिलीभगत करके काम कर रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि गिरफ़्तार किए गए मज़दूर, कार्यकर्ता और पत्रकार — जो भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत के असली उत्तराधिकारी हैं — जल्द ही रिहा कर दिए जाएंगे।
दिल्ली यूनिवर्सिटी की रिटायर्ड प्रोफ़ेसर और नागरिक व लोकतांत्रिक अधिकारों की प्रमुख कार्यकर्ता नंदिता नारायण ने घोषणा की कि शिक्षा आंदोलन के लिए संयुक्त मंच – जिसमें स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर के शिक्षकों के सभी राष्ट्रीय स्तर के संगठन शामिल है – मज़दूर वर्ग की जायज़ मांगों और उनके संघर्षों के साथ मज़बूती से खड़ा है। उन्होंने कहा कि हम पर पूंजीपतियों के पक्ष वाली सरकार शासन कर रही है, जो मज़दूरों के मानवीय और सम्मानजनक जीवन के बजाय कंपनियों के खुले मुनाफ़े की मंशा को प्राथमिकता देती है। नोएडा की घटनाओं ने दिखाया है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार पूंजीपति वर्ग के एजेंट की तरह काम कर रही है और प्रदर्शनकारी मज़दूरों पर राज्य की पुलिस का इस्तेमाल कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील चौधरी अली ज़िया कबीर ने यूपी पुलिस के दावों में एक बड़ी खामी की ओर इशारा किया: अगर यह सब एक साज़िश थी, तो यूपी पुलिस ने मज़दूरी क्यों बढ़ाई? उन्होंने कम से कम कागज़ों पर ही सही, मज़दूरों की मुख्य मांग को क्यों माना? यह दौर सिर्फ़ दमन का नहीं, बल्कि असहमति को सीधे तौर पर अपराध की श्रेणी में डालने का है। कबीर ने आगे कहा – चार्जशीट में एनएसए लगाने की वजहें क्यों नहीं बताई गई हैं? उनमें गिरफ़्तारी की प्रक्रिया में हुई गंभीर गड़बड़ियों का ज़िक्र क्यों नहीं है? कबीर ने कहा कि यहाँ ऐसा लगता है कि हर आरोप असल में एक कबूलनामा है: हिंसा पुलिस ने ही भड़काई थी।
कलाकार और रक़्स मीडिया कलेक्टिव के सदस्य शुद्धाब्रत सेनगुप्ता, जो कासना जेल में सृष्टि से मिलने भी गए थे, ने कहा कि सृष्टि व आकृति जैसी कलाकारों का उत्पीड़न कला के भविष्य पर ही सवालिया निशान लगाता है। उन्होंने कलाकारों के एक समूह द्वारा हाल ही में एकजुटता बैठक में तैयार किए गए बयान को पढ़कर सुनाया, जिसमें आज आकृति, सृष्टि और अन्य लोगों के साथ खड़े होने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया था, क्योंकि वे ऐसी कलाकार थीं जो बस एक सच्चे कलाकार के तौर पर अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा रही थीं।
उन्होंने कहा कि सृष्टि ने अपनी कला का इस्तेमाल नोएडा की सड़कों पर नोएडा के मज़दूरों के संघर्ष को दिखाने के लिए किया; आकृति एक थिएटर कलाकार हैं जो थिएटर को एक ऐसी कला विधा के रूप में देखती हैं जिसमें लोगों को अपनी परिस्थितियाँ बदलने के लिए प्रेरित करने की क्षमता है। आज, इस देश की कानून-व्यवस्था कला को अपराध की श्रेणी में डाल रही है, और इस हमले का विरोध करना ही असल में कलाकार होने का मतलब है।
वकील कवलप्रीत कौर ने कहा कि चार्जशीट “बेतुकी बातों और झूठ” से भरी हुई है। उन्होंने कहा कि पिछले तीन महीनों में यूपी पुलिस की कार्रवाइयों ने यह दिखा दिया है कि हम ऐसे दौर में आ गए हैं जहाँ हमें असल में पुलिस से सुरक्षा की ज़रूरत है, क्योंकि वह किसी के भी साथ कुछ भी कर सकती है।
(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)